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साहब एक सूखा पत्ता हूं टेहनी से टूटा
तो ये जमीं  संभाल लेगी।
मेरे यारों महफ़िल को अलविदा कहने दो
देर हुए तो मेरी दोस्त घर से निकाल देगी।
दोस्त पैसा ही इल्म पैसा ही ख़ुदा पैसा ही हैं सब कुछ
एक मछली को लुभा ओरो को पकड़ने खुद ही जाल देगी।

फितरत है उसकी आखेट की नहीं देता में उसे कोई आयुध
दू तो अभी लाके हाथ में कोई पशु की खाल देगी।
जानी पहचानी सौदागर थी वो इश्क़ की में भी गया बाज़ार सोच के की मुझे भी कुछ माल देगी।___Rajdeep Kota

साहब में भूखा हूं मुझे खाना नहीं
थोड़ा रहम ही मयस्सर करा दो।
दिए की लौ डगमगाने लगी हैं
मेरी दोस्त से मुलाक़ात पलभर करा दो।

वोही आख़िरी जरिया हैं जीने का कोई
उनकी बातों से यादों से मेरा जिहन तरबतर करा दो।___Rajdeep Kota

ग़ज़ल शेर

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