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सम्पूर्ण भीम और बकासुर कथा

भीम पांच पांडवों में से एक थे। पांडवों को अपने उत्तराधिकार के लिए अपने सौ चचेरे भाइयों से लड़ना पड़ा था। कुरुक्षेत्र के युद्ध के बाद पांडवों को हस्तिनापुर का राज्य मिल गया था। लेकिन उससे पहले उनके चचेरे भाइयों ने, जो कौरव कहलाते थे, उन्हें खत्म करने के अनेकों प्रयत्न किये। एक बार कौरवों के इस प्रकार के षड्यंत्रों से अपनी रक्षा करते पांचों भाई अपनी मां कुंती के साथ एकचक्र नामक एक शांतिपूर्ण गांव में पहुंचे। उन्हें वह स्थान पसंद आया और उन्होंने तय किया कि जब तक कौरवों को उनका पता न लग जाय, वे उसी गांव में रहेंगे। वे रहने का स्थान खोज रहे थे कि एक कृपालु ग्रामीण ने उनसे अपने मकान में चलकर रहने को कहा। उसका मकान काफी बड़ा था। पांडवों ने उसको धन्यवाद दिया और उसके घर रहने चले गये। एक दिन भीम और कुंती बैठे बातें कर रहे थे कि उन्हें लग जैसे कोई रो रहा है।

कुंती झटपट उठकर देखने के लिए अंदर गयी कि क्या हुआ है। जैसे ही वह कमरे के निकट पहुंचीं, उन्हें ग्रामीण परिवार की बातचीत सुनायी दी। गृहस्वामी कह रहा था, "अब तो बड़ी देर हो चुकी है। कहीं जाने का समय नहीं रहा न सोनापपहींगला तिखामोति नगरिजा भी व्यक्ति को नहीं छोड़ सकते। मैंने तुमसे कितनी बार कहा कि कहीं ओर चले जायें। लेकिन तुम राजी नहीं हुई। तुमने कहा कि मैं यहीं जन्मी हूं और यहीं मरूंगी। अब तुम्हारी इच्छा पूरी होने वाली है। सिर्फ तुम नहीं मरोगी, हम चारों मरेंगे।" यह सुनकर हैरानी और भय से कुंती के पैर मानों जम गये। "इससे अच्छा क्या हो सकता है कि हम दोनों और हमारे बच्चे साथ ही मर जायें। इससे अधिक हमें और क्या चाहिए? लेकिन हमारा दुर्भाग्य, मरना तो सिर्फ एक को है। मैंने बहुत सोचा। यह हो नहीं सकता कि बच्चों में से किसी का बलिदान किया जाय। रह गये आप और मैं। अगर मृत्यु आपको उठा ले गयी तो इन दोनों बच्चों का पालन-पोषण मैं कैसे करूंगी? मैं किस तरह अपना और इनका पेट पालुंगी? कौन-सा काम करूंगी कि इज्जत के साथ निर्वाह हो जाय। बेटी का ब्याह कैसे करूंगी? इस कारण मुझे ही जाना चाहिए जिससे आप रहकर बच्चों की देखभाल करते रहें। फिर यह मेरे लिये उचित दंड भी होगा क्योंकि आपकी इच्छा के खिलाफ यहां बने रहने का हठ मैंने ही किया था। तो अब चर्चा बंद करें। फैसला हो गया।" कुंती समझ गयीं कि इस नेक ग्रामीण परिवार के ऊपर कोई भयानक संकट आया है। उन्होंने सोचा कि आगे बढ़कर पूछे कि क्या बात है। तभी अचानक लड़की का स्वर सुनकर रुक गयीं। लड़की स्वयं मरने के लिए जाना चाह रही थी ताकि उसके माता-पिता दोनों जीवित रहकर उसके नन्हे भाई का लालन-पालन कर सकें।

 अब तो कुंती से नहीं रहा गया। जल्दी से कमरे के अंदर जाकर बोली, "क्षमा कीजिए। मैंने आपकी बातचीत सुन ली है। मैं आपके दुख का कारण जानना चाहती हूं। हो सकता है हम आपकी सहायता कर सकें। जो भी संकट है, कम से कम हम सब मिलकर उसका सामना कर सकते हैं।" कुंती एकदम अंदर आकर बोलने लगीं तो ग्रामीण परिवार चकित होकर उनका मुंह ताकने लगा। उनकी बात सुनकर पुरुष ने कहा, "आप दयालु हैं। आपकी बड़ी कृपा है कि हमारी सहायता करना चाहती हैं। लेकिन हमारी सहायता कोई मनुष्य नहीं कर सकता, कर सकता है तो बस भगवान।" "मझे सारी बात बताइए," कुंती ने आग्रह किया। "इस देश का राजा डरपोक है। शासन करना नहीं जानता और मूर्ख भी है। आलसी होने के कारण उसने राजकाज देखने के लिए कई अधिकारियों को नियुक्त किया है जो राजा के नाम से शासन करते हैं। इस गांव का और आसपास के इलाकों का शासक वक नाम का दैत्य है। वह नरभक्षक है - पहाड़ जैसा ऊंचा और भारी-भरकम, लंबे-लंबे उलझे बाल और लाल डरावनी आंखें। जब वह चलता है तो धरती कांपने लगती है। जब वह गरजता है तो आकाश में चिड़ियां डर के मारे तितर-बितर होकर उड़ जाती हैं। हमें प्रतिदिन एक गाड़ी भरकर भात, दो भैंसें और एक आदमी उसके खाने के लिए भेजना पड़ता है। न भेजें तो हमारी खैर नहीं। इसलिए हम सबने फैसला किया था कि प्रति दिन

बारी-बारी एक परिवार से एक व्यक्ति दैत्य का भोजन बनने के लिए भेजा जाय। कल हमारे परिवार की बारी है। हम चार हैं। हम यही तय करने की कोशिश कर रहे हैं कि कल हममें से किसका बलिदान किया जाय।" इस विचित्र और भयानक कहानी को सुनकर कुंती अवाक् रह गयीं। लेकिन उन्होंने मन में संकल्प कर लिया कि ग्रामीण परिवार की सहायता अवश्य करेंगी। बहुत सोचकर उन्होंने एक फैसला किया। "अगर आप स्वीकार करें तो मैं एक सुझाव दूं?" "हम अवश्य आपकी बात मानेंगे। हम लोग तो इतने परेशान हैं कि कुछ सूझता ही नहीं।" "तो सुनिए," कुंती ने कहा। “आपका एक ही पुत्र है और वह भी अभी बच्चा है। मेरे पांच जवान तगड़े बेटे हैं। उनमें से एक कल भात की गाड़ी और भैंसें लेकर राक्षस के पास चला जाय।" ग्रामीण ने अपने कानों पर दोनों हाथ रख लिये मानों कुंती ने जो कहा उसे सुनना भी पाप हो। "देवी, आपकी बात को मैं सुन भी नहीं सकता, उसे मानना तो रक्षा करने के लिए आपके पुत्र के बलिदान की बात सोचना भी पाप है।" कुंती ने बड़ी कठिनाई से ग्रामीण को शांत किया, फिर उसको समझाने लगीं। गर्व से मुस्कराकर बोली, “आप मेरे पुत्रों को नहीं जानते। मैं खास तौर से अपने मंझले पुत्र के बारे में सोच रही थी। मैं भी उसको उतना ही प्यार करती हूं जितना आप अपने बेटे को। लेकिन राक्षसों से लड़ने का उसे खूब अभ्यास है। उसका भी डील-डोल राक्षसों जैसा ही है और चाल तो हवा की तरह तेज है। मेरी बात मानिए, मेरे बेटे को बकासुर के पास जाने दीजिए।" यह कह कर कुंती अपने कमरे में वापस चली गयीं। उन्होंने अपने पुत्रों को बकासुर के बारे में बताया और कहा कि वह उनमें से एक को राक्षस के पास दूर। अपनी

बारी-बारी एक परिवार से एक व्यक्ति दैत्य का भोजन बनने के लिए भेजा जाय। कल हमारे परिवार की बारी है। हम चार हैं। हम यही तय करने की कोशिश कर रहे हैं कि कल हममें से किसका बलिदान किया जाय।" इस विचित्र और भयानक कहानी को सुनकर कुंती अवाक् रह गयीं। लेकिन उन्होंने मन में संकल्प कर लिया कि ग्रामीण परिवार की सहायता अवश्य करेंगी। बहुत सोचकर उन्होंने एक फैसला किया। "अगर आप स्वीकार करें तो मैं एक सुझाव दूं?" "हम अवश्य आपकी बात मानेंगे। हम लोग तो इतने परेशान हैं कि कुछ सूझता ही नहीं।" "तो सुनिए,” कुंती ने कहा। "आपका एक ही पुत्र है और वह भी अभी बच्चा है। मेरे पांच जवान तगड़े बेटे हैं। उनमें से एक कल भात की गाड़ी और भैंसें लेकर राक्षस के पास चला जाय।" ग्रामीण ने अपने कानों पर दोनों हाथ रख लिये मानों कुंती ने जो कहा उसे सुनना भी पाप हो। "देवी, आपकी बात को मैं सुन भी नहीं सकता, तो रक्षा करने के लिए आपके पुत्र के बलिदान की बात सोचना भी पाप है।" कुंती ने बड़ी कठिनाई से ग्रामीण को शांत किया, फिर उसको समझाने लगीं। गर्व से मुस्कराकर बोली, “आप मेरे पुत्रों को नहीं जानते। मैं खास तौर से अपने मंझले पुत्र के बारे में सोच रही थी। मैं भी उसको उतना ही प्यार करती हूं जितना आप अपने बेटे को। लेकिन राक्षसों से लड़ने का उसे खूब अभ्यास है। उसका भी डील-डोल राक्षसों जैसा ही है और चाल तो हवा की तरह तेज है। मेरी बात मानिए, मेरे बेटे को बकासुर के पास जाने दीजिए।" यह कह कर कुंती अपने कमरे में वापस चली गयीं। उन्होंने अपने पुत्रों को बकासुर के बारे में बताया और कहा कि वह उनमें से एक को राक्षस के पास उसे मानना दूर। अपनी

भेजने का वायदा कर आयी हैं। भीम ने हंसकर कहा, "मैं जाऊंगा मां। मैं ही इस काम के लिए ठीक हूं। पक्का समझो।" दूसरे दिन भीम ने बकासुर का भोजन जुटाया और खुशी-खुशी जंगल की ओर चल पड़ा जहां राक्षस रहता था। बकासुर अपने घर से देख रहा था। गाड़ीवान की ऊंचाई, उसके विशाल शरीर, उसकी बलिष्ठ भुजाओं और चौड़ी छाती को देखकर उसने संतोष से सिर हिलाया "हां, आज खाने में मजा आयेगा।" लेकिन दूसरे ही क्षण उत्तकी भौहें तन गयीं। भैंसें कहां हैं? अगले ही क्षण उसने भीम को जो करते देखा उससे उसका आश्चर्य क्रोध में बदल गया। भीम ने जमीन पर केले का बड़ा-सा पत्ता बिछाया और आराम से बैठ गया। फिर बहुत बड़े बेलचे से गाड़ी में से खाना निकाल-निकाल कर पत्तल पर रखने लगा। राक्षस के देखते-देखते भात, तरकारी और दूसरी चीजें तेजी से भीम के अथाह सुरंग जैसे पेट में पहुंचने लगीं। क्रोध के मारे राक्षस पागल-सा हो गया। बड़े जोरों से गर्जना करता वह आगे बढ़ा और भीम से कुछ ही दूरी पर खड़ा हो गया। भीम ने बक के पेड़ के तनों जैसी टांगों की ओर देखा और फिर पत्तल में भात परोसने लगा। बकासुर और निकट आया। "कैसे मूर्ख हो तुम जो ल्क के क्रोध का शिकार बनना चाहते हो। क्या तुम नहीं जानते कि तुम्हें मेरा आहार बनने के लिए भेजा गया है? और मेरी भैंसें कहां हैं?" भीम ने थोड़ा भात और मसालेदार तरकारी का एक बड़ा ग्रास मुंह में भरा और उसे निगलकर कहा,“ भैंसें नहीं हैं।" बक ने गरज कर पूछा, “क्या मतलब?" भीम ने ठंडे स्वर में समझाया, "गांव में मवेशियों की कमी है। हमें अपनी गऊओं और भैंसों की जरूरत है। गांव के बच्चों को दूध चाहिए न।" क्रोध से कांपते हुए बकासुर भीम की ओर झपटा। भीम हिला-डुला नहीं।

राक्षस भीम के पीछे खड़ा हो गया और उसको उठाना चाहा। उसने अपनी सारी ताकत लगा दी लेकिन वह पांडव योद्धा टस से मस नहीं हुआ। तब बक ने अपनी दोनों विशाल बाहें उठायीं और भीम की गर्दन पर प्रहार किया। "अरे, जाओ भी यहां से," भीम ने ऐसे कहा मानों चोट से उसका केवल एक बाल इधर-उधर हो गया हो। “तुम मुझे बेकार तंग कर रहे हो और इस बढ़िया खाने का मजा बिगाड़ रहे हो।" आश्चर्य और क्रोध के मारे बकासुर जड़ होकर खड़ा रहा। उसकी आंखों के सामने भीम ने गाड़ी का सारा भोजन चट कर दिया, फिर डकार ली और हाथ धोने लगा। फिर कुश्ती के लिए तैयार होकर भीम ने कहा, “अगर तुम तैयार हो तो आओ दो-दो हाथ हो जायें।" बकासुर तन कर भीम की ओर लपका। भीम ने बिजली की तरह कूद कर राक्षस को धराशायी कर दिया और उसके पेट पर चढ़ बैठा। बक करवट लेकर भीम के नीचे से निकल गया, और जड़ समेत एक पेड़ को उखाड़ कर भीम की ओर झपटा। भीम ने भी अपने दाहिने हाथ से एक पेड़ उखाड़ लिया और उसको सामने करके बक के वार को रोकने की चेष्टा करने लगा। दोनों योद्धा एक-दूसरे को पेड़ फेंक-फेंक कर मारने लगे। उनकी लड़ाई से घबराकर चिड़ियां डर के मारे इधर-उधर उड़ती रहीं फिर दूर जाकर बैठ गयीं और लड़ाई देखने लगीं। पर्वत

जैसे उन यौद्धाओं की टक्करों से मीलों तक धरती कांपने लगी मानों भूचाल आ गया हो। जल्दी ही बकासुर थकान के मारे हांफने लगा। अब वह किसी तरह इस दैत्य से बचकर भाग जाना चाहता था जो उसकी जान लेने के लिए आया था। लेकिन भीम ने उसको जाने नहीं दिया। जब बकासुर भाग जाने की कोशिश करता तो

भीम उसको पीछे खींचकर उस पर लातें और घूसे बरसाता। अंत में भीम ने इतने जोरों का वार किया कि बकासुर चारों खाने चित्त हो गया। उसकी पीठ पर घुटना रखकर भीम ने उसके सिर और टांगों को इतनी जोर से पीछे मोड़ा कि उसकी रीढ़ की हड्डियां तड़तड़ा कर टूट गयीं। दर्द के मारे बकासुर इतने जोरों से गरजा कि जंगल के शेर और बाघ तक डर के मारे अपनी-अपनी मांदों में जा छिपे। भयंकर गर्जना के साथ बकासुर मर गया। जब बकासुर के घर वालों और नातेदारों ने मृत्यु से पहले उसकी चीख सुनी तो वे भागे-भागे उस जगह आ पहुंचे और भीम के चरणों पर गिरकर क्षमा-याचना करने लगे। भीम का चेहरकठोर था, लेकिन उसकी बात न्याय-संगत थी। वह बोला, “तुम लोग इस जंगल में एक ही शर्त पर रह सकते हो कि आज से तुम नरभक्षक नहीं रहोगे। नरमांस खाना छोड़ दोगे। अगर यह शर्त स्वीकार नहीं तो एकचक्र के किसी भी आदमी को हाथ लगाने से पहले

मुझको खाना पड़ेगा।" दैत्य परिवार की हर स्त्री और बच्चे ने कसम खायी कि वे नरमांस खाना बिल्कुल छोड़ देंगे। के मृत शरीर को खींच कर गांव के बाहर छोड़ दिया। फिर वह अपनी माता को यह शुभ समाचार सुनाने चल दिया। 

भीम और बकासुर

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सम्पूर्ण भीम और बकासुर कथा