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श्रीविष्णुपुराण - तृतीय अंश - अध्याय १८


 
श्रीपराशरजी बोले - 
हे मैत्रेय ! तदनन्तर मायामोहने ( देवताओंके साथ ) जाकर देखा कि असुरगण नर्मदाके तटपर तपस्यामें लगे हुए हैं ॥१॥
तब उस मयूरपिच्छधारी दिगम्बर और मुण्डितकेश मायामोहने असुरोंसे अति मधुर वाणीमें इस प्रकार कहा ॥२॥
मायामोह बोला - 
हे दैत्यपतिगण ! कहिये, आपलोग किस उद्देश्यसे तपस्या कर रहे हैं, आपको किसी लौकिक फलकी इच्छा है या पारलौकिककी ? ॥३॥
असुरगण बोले - 
हे महामते ! हमलोगोंने पारलौकिक फलकी कामनासे तपस्या आरम्भ की है । इस विषयमें तुमको हमसे क्या कहना है ? ॥४॥
मायामोह बोला - 
यदि आपलोगोंको मुक्तिकी इच्छा है तो जैसा मैं कहता हुँ वैसा करो । आपलोग मुक्तिके खुले द्वाररूप इस धर्मका आदर कीजिये ॥५॥
यह धर्म मुक्तिमें परमोपयोगी है । इससे श्रेष्ठ अन्य कोई धर्म नहीं है । इसका अनुष्ठान करनेसे आपलोग स्वर्ग अथवा मुक्ति जिसकी कामना करेंगे प्राप्त कर लेंगे । आप सबलोग महाबलवान् हैं, अतः इस धर्मका आदर कीजिये ॥६-७॥
श्रीपराशरजी बोले - 
इस प्रकार नाना प्रकारकी युक्तियोंसे अतिरिज्जित वाक्योंद्वारा मायामोहने दैत्यगणको वैदिक मार्गसे भ्रष्ट कर दिया ॥८॥
'यह धर्मयुक्त है और यह धर्मविरुद्ध है, यह सत् है और यह असत् है, यह मुक्तिकारक है और इससे मुक्ति नहीं होती , यह आत्यन्तिक परमार्थ है और यह परमार्थ नहीं है, यह कर्तव्य है और यह अकर्त्तव्य है, यह ऐसा नहीं है और यह स्पष्ट ऐसा ही है, यह दिगम्बरोंका धर्म है और यह साम्बरोंका धर्म है' - हे द्विज ! ऐसे अनेक प्रकारके अनन्त वादोंको दिखलाकर मायामोहने उन दैत्योंको स्वधर्मसे च्युत कर दिया ॥९-१२॥
मायामोहने दैत्योंसे कहा था कि आपलोग इस महाधर्मको 'अर्हत' अर्थात् इसका आदर कीजिये । अतः उस धर्मका अवलम्बन करनेसे वे ' आर्हत' कहलाये ॥१३॥
मायामोहने असुरगणको त्रयीधर्मसे विमुख कर दिया और वे मोहग्रस्त हो गये: तथा पीछे उन्होंने अन्य दैत्योंको भी इसी धर्ममें प्रवृत्त किया ॥१४॥
उन्होंने दुसरे दैत्योंको दुसरोंने तीसरोंको, तीसरोंने चौथोंको तथा उन्होंने औरोंको इसी धर्ममें प्रवृत्त किया । इस प्रकार थोडे़ ही दिनोंमें दैत्यगणने वेदत्रयीका प्रायः त्याग कर दिया ॥१५॥
तदनन्तर जितेन्द्रिय मायामोहने रक्तवस्त्र धारणकर अन्यान्य असुरोंके पास जा उनसे मृदु, अल्प और मधुर शब्दोंमें कहा - ॥१६॥
" हे असुरगण ! यदि तुमलोगोंको स्वर्ग अथवा मोक्षकी इच्छा है तो पशुहिंसा आदि दुष्टकर्मोखो त्यागकर बोध प्राप्त करो ॥१७॥
यह सम्पूर्ण जगत् विज्ञानमय है - ऐसा जानो ! मेरे वाक्योंपर पूर्णतया ध्यान दो । इस विषयमें बुधजनोंका ऐसा ही मत है कि यह संसार अनाधार है, भ्रमजन्य पदार्थोंकी प्रतीतिपर ही स्थिर है तथा रागादि दोषोंसे दुषित है । इस संसारसंकटमें जीव अत्यन्त भटकता रहा है " ॥१८-१९॥
इस प्रकार' बुध्यत ( जानो ), बुध्यध्वं ( समझो ), बुध्यत ( जानो )' आदि शब्दोंसे बुद्धधर्मका निर्देश कर मायामोहने दैत्योंसे उनका निजधर्म छुड़ा दिया ॥२०॥
मायामोहने ऐसे नाना प्रकारके युक्तियुक्त वाक्य कहे जिससे उन दैत्यगणने त्रयीधर्मको त्याग दिया ॥२१॥
उस दैत्यगणने अन्य दैत्योंसे तथा उन्होंने अन्यान्यसे ऐसे ही वाक्य कहे । हे मैत्रेय ! इस प्रकार उन्होंने श्रुतिस्मृतिविहित अपने परम धर्मको त्याग दिया ॥२२॥
हे द्विज ! मोहकारी मायामोहने और भी अनेकानेक दैत्योंको भिन्न - भिन्न प्रकारके विविध पाषण्डोंसे मोहित कर दिया ॥२३॥
इस प्रकार थोडे़ ही समयमें मायामोहके द्वारा मोहित होकर असुरगणने वैदिक धर्मकी बातचीत करना भी छोड़ दिया ॥२४॥
हे द्विज ! उनमेंसे कोई वेदोंकी, कोई देवताओंकी, कोई याज्ञिक कर्म - कलापोंकी तथा कोई ब्राह्मणोंकी निन्दा करने लगे ॥२५॥
( वे कहने लगे - ) "हिंसासे भी धर्म होता है - यह बात किसी प्रकार युक्तिसंगत नहीं है । अग्निमें हवि जलानेसे फल होगा - यह भी बच्चोंकी - सीं बात हैं ॥२६॥
अनेकों यज्ञोंके द्वारा देवत्व लाभ करके यदि इन्द्रको शमी आदि काष्ठका ही भोजन करना पड़ता है तो इससे तो पत्ते खानेवाला पशु ही अच्छा है ॥२७॥
यदि यज्ञमें बलि किये गये पशुको स्वर्गकी प्राप्ति होती है तो यजमान अपने पिताको ही क्यों नहीं मार डालता ? ॥२८॥
यदि किसी अन्य पुरुषके भोजन करनेसे भी किसी पुरुषकी तृप्ति हो सकती है तो विदेशकी यात्राके समय खाद्यपदार्थं ले जानेका परिश्रम करनेकी क्या आवश्यकता है; पुत्रगण घरपर ही श्राद्ध कर दिया करें ॥२९॥
अतः यह समझकर कि ' यह ( श्राद्धदि कर्मकाण्ड ) लोगोंकी अन्ध- श्रद्धा ही हैं' इसके प्रति उपेक्षा करनी चाहिये और अपने श्रेयः साधनके लिये जो कुछ मैंने कहा है उसमें रुचि करनी चाहिये ॥३०॥
हे असुरगण ! श्रुति आदि आप्तवाक्य कुछ आकाशसे नहीं गिरा करते हम, तुम और अन्य सबको भी युक्तियुक्त वाक्योंको ग्रहण कर लेना चाहिये ॥३१॥
श्रीपराशरजी बोले - 
इस प्रकार अनेक युक्तियोंसे मायामोहने दैत्योंको विचलिक्त कर दिया जिससें उनमेंसे किसीकी भी वेदत्रयीमें रुचि नहीं रही ॥३२॥
इस प्रकार दैत्योंके विपरित मार्गमें प्रवृत्त हो जानेपर देवगण खुब तैयारी करके उनके पास युद्धके लिये उपस्थित हुए ॥३३॥
हे द्विज ! तब देवता और असुरोंमें पुनः संग्राम छिड़ा । उसमें सन्मार्गविरोधी दैत्यगण देवताओंद्वारा मारे गये ॥३४॥
हे द्विज ! पहले दैत्योंके पास जो स्वधर्मरूप कवच था उसीसे उनकी रक्षा हुई थी । अबकी बार उसके नष्ट हो जानेसे वे भी नष्ट हो गये ॥३५॥
हे मैत्रेय ! उस समयसे जो लोग मायामोहद्वारा प्रवर्तित मार्गका अवलम्बन करनेवाले हुए । वे ' नग्न' कहलाये क्योंकिं उन्होंने वेदत्रयीरूप वस्त्रको त्याग दिया था ॥३६॥
ब्रह्माचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासी - ये चार ही आश्रमी हैं । इनके अतिरिक्त पाँचवाँ आश्रमी और कोई नहीं है ॥३७॥
हे मैत्रेय ! जो पुरुष गृहस्थाश्रमको छोड़नेके अनन्तर वानप्रस्थ या संन्यासी नहीं होता वह पापी भी नग्न ही है ॥३८॥
हे विप्र ! सामर्थ्य रहते हुए भी जो विहित कर्म नहीं करता वह उसी दिन पतित हो जाता है और उस एक दिन-रातमें ही उसके सम्पूर्ण नित्यकर्मोंका क्षय हो जाता है ॥३९॥
हे मैत्रेय ! आपत्तिकालको छोड़कर और किसी समय एक पक्षतक नित्यकर्मका त्याग करनेवाला पुरुष महान प्रायश्चित्तसे हि शुद्ध हो सकता है ॥४०॥
जो पुरुष एक वर्षतक नित्य- क्रिया नहीं करता उसपर दृष्टि पड़ जानेसे साधु पुरुषको सदा सूर्यका दर्शन करना चाहिये ॥४१॥
हे महामते ! ऐसे पुरुषका स्पर्श होनेपर वस्त्रसहित स्नान करनेसे शुद्धि हो सकती है और उस पपात्माकी शुद्धि तो किसी भी प्रकार नहीं हो सकती ॥४२॥
जिस मनुष्यके घरसे देवगण, ऋशिगण, पितृगण और भूतगण बिना पूजित हुए निःश्वास छोड़ते अन्यत्र चले जाते हैं, लोकमें उससे बढकर और कोई पापी नहीं है ॥४३॥
हे द्विज ! ऐसे पुरुषके साथ एक वर्षतक सम्भाषण, कुशलप्रश्न और उठने-बैठनेसे मनुष्य उसीके समान पापात्मा हो जाता है ॥४४॥
जिसका शरीर अथवा गृह देवता आदिके निःश्वाससे निहत है उसके साथ अपने गृह, आसन और वस्त्र आदिको न मिलावे ॥४५॥
जो पुरुष उसके घरमें भोजन करता है, उसका आसन ग्रहण करता है अथवा उसके साथ एक ही शय्यापर शयन करता है वह शीघ्र ही उसीके समान हो ताजा है ॥४६॥
जो मनुष्य देवता, पितर, भूतगण और अतिथियोंका पूजन किये बिना स्वयं भोजन करता है वह पापमय भोजन करता है; उसकी शुभागति नही हो सकती ॥४७॥
जो ब्राह्मणादि वर्ण स्वधर्मको छोड़कर परधर्मोंमें प्रवृत्त होते है अथवा हीनवृत्तिका अवलम्बन करते है वे, ' नग्न' कहालाते हैं ॥४८॥
हे मैत्रेय ! जिस स्थानमें चारों वर्णोका अत्यन्त मिश्रण हो उसमें रहनेसे पुरुषकी साधुवृत्तियोंका क्षय हो जाता है ॥४९॥
जो पुरुष ऋषि, देव, पितृ, भूत, और अतिथिगणका पूजन किये बिना भोजन करता है उससे सम्भाषण करनेसे भी लोग नरकमें पडते है ॥५०॥
अतः वेदत्रयीके त्यागसे दूषित इन नग्नोंके साथ प्राज्ञपुरुष सर्वदा सम्भाषण और स्पर्श आदिका भी त्याग कर दे ॥५१॥
यदि इनकी दृष्टि पड़ जाय तो श्रद्धावान पुरुषोंका यत्नपूर्वक किया हुआ श्राद्ध देवता अथवा पितृपितामहगणकी तृप्ति नहीं करता ॥५२॥
सुना जाता है, पूर्वकालमें पृथिवीत्तलपर शतधनु नामसे विख्यात एक राजा था । उसकी पत्नी शैव्या अत्यन्त धर्मपरायणा थी ॥५३॥
वह महाभागा पतिव्रता, सत्य, शौच और दयासे युक्त तथा विनय और नीति आदि सम्पूर्ण सुलक्षणोंसे सम्पन्न थी ॥५४॥
उस महारानीके साथ राजा शतधनुने परम - समाधिद्वारा सर्वव्यापकः देवदेव श्रीजनार्दनकी आराधना की ॥५५॥
वे प्रतिदिन तन्मय होकर अनन्यभावासे होम, जप, दान, उपवास और पूजन आदिद्वारा भगवान्‌की भक्तिपूर्वक आराधना करने लगे ॥५६॥
हे द्विज ! एक दिन कार्तिकी पूर्णिमाको उपवास कर उन दोनों पति-पत्नियोंने श्रीगंगाजीमें एक साथ ही स्नान करनेके अनन्तर बाहर आनेपर एक साथ ही स्नान करन्के अनन्तर बाहर आनेपर एक पाषण्डीको सामने आता देखा ॥५७॥
यह ब्राह्मण उस महात्मा राजाके धनुर्वेदाचार्यका मित्र था; अतः आचार्यके गौरववश राजाने भी उससे मित्रवत् व्यवहार किया ॥५८॥
किन्तु उसकी पतिव्रता पत्नीने उसका कुछ भी आदर नहीं किया; वह मौन रही और यह सोचकर कि मैं उपोषिता ( उपवासयुक्त ) हूँ उसे देखकर सूर्यका दर्शन किया ॥५९॥
हे द्विजोत्तम ! फिर उन स्त्री-पुरुषोनें यथारीति आकर भगवान् विष्णुके पूजा आदिक सम्पूर्ण कर्म विधिपूर्वक किये ॥६०॥
कालान्तरमें वह शत्रुजित राजा मर गया । तब देवी शैव्याने भी चितारुढ़ महाराजका अनुगमन किया ॥६१॥
राजा शतधनुने उपवास - अवस्थाने पाखण्डीसे वार्तालाप किया था । अतः उस पापके कारण उसने कुत्तेका जन्म लिया ॥६२॥
तथा वह शुभलक्षणा काशीनरेशकी कन्या हुई, जो सब प्रकारके विज्ञानसे युक्त, सर्वलक्षणसम्पन्ना और जातिस्मरा ( पूर्वजन्मका वृतान्त जाननेवाली ) थी ॥६३॥
राजाने उसे किसे वरको देनेकी इच्छा की, किन्तु उस सुन्दरीके ही रोक देनेपर वह उसके विवाहादिसे उपरत हो गये ॥६४॥
तब उसने दिव्य दृष्टिसे अपने पतिको श्वान हुआ जान विदिशा नामक नगरमें जाकर उसे वहाँ कुत्तेकी अवस्थामें देखा ॥६५॥
अपने महाभाग पतिको श्वानरूपमें देखकर उस सुन्दरीने उसे सत्कारपूर्वक अति उत्तम भोजन कराया ॥६६॥
उसके दिये हुए उस अति मधुर और इच्छित अन्नको खाकर वह अपनी जातिके अनुकुल नाना प्रकारकी चाटुता प्रदर्शित करने लगा ॥६७॥
उसके चाटुता करनेसे अत्यन्त संकुचित हो उस बालिकाने कुत्सित योनिमें अत्यन्त संकुचित हो उस बालिकाने कुत्सित योनिमें उप्तन्न हुए उस अपने प्रियतमको प्रणाम कर उससे इस प्रकार कहा - ॥६८॥
"महाराज ! आप अपनी उस उदारताका स्मरण कीजिये जिसके कारण आज आप श्वान - योनिको प्राप्त होकर मेरे चाटुकार हुए हैं ॥६९॥
हे प्रभो ! क्या आपको यह स्मरण नहीं है कि तीर्थस्नानके अनन्तर पाखण्डीसे वार्तालाप करनेके कारण ही आपको यह कुत्सित योनि मिली है ? " ॥७०॥
श्रीपराशरजी बोले - 
काशिराजसुताद्वारा इस प्रकार स्मरण कराये जानेपर उसने बहुत देरतक अपने पूर्वजन्मका चिन्तन किया ! तब उसे अति दुर्लभ निर्वेद प्राप्त हुआ ॥७१॥
उसने अति उदास चित्तसे नगरके बाहर आ प्राण त्याग दिये और फिर श्रृगाल- योनिमें जन्म लिया ॥७२॥
तब, काशिराजकन्या दिव्या दृष्टिसे उसे दुसरे जन्ममें श्रृगाल हुआ जान उसे देखनेके लिये कोलहाल - पर्वतपर गयी ॥७३॥
वहाँ भी अपने पतिको श्रृगाल - योनिमें उप्तन्न हुआ देख वह सुन्दरी राजकन्या उससे बोली - ॥७४॥
"हे राजेन्द्र ! श्वान- योनिमें जन्म लेनेपर मैंने आपसे जो पाखण्डसे वार्तालापविषयक पूर्वजन्मका वृत्तान्त कहा था क्या वह आपको स्मरण है ? " ॥७५॥
तब सत्यनिष्ठोंमे श्रेष्ठ राजा शतधनुने उसके इस प्रकार कहनेपर सारा सत्य वृतान्त जानकर निराहर रह वनमें अपना शरीर छोड़ दिया ॥७६॥
फिर वह एक भेड़िया हुआ; उस समय भी अनिन्दिता राजकन्याने उस निर्जन वनमें जाकर अपने पतिको उसके पूर्वजन्मका वृतान्त स्मरण कराया ॥७७॥
( उसने कहा - ) " हे महाभाग ! तुम भेड़िया नहीं हो, तुम राजा शतधनु हो ! तुम ( अपने पूर्वजन्मोंमें ) क्रमशः कुक्कुर और श्रृगाल होकर अब भेड़िया हुए हो" ॥७८॥
इस प्रकार उसके स्मरण करानेपर राजाने जब भेड़ियेके शरीरको छोड़ा तो गृध- योनिमें जन्म लिया । उस सम्य भी उसकी निष्पाप भार्याने उसे फिर बोध कराया ॥७९॥
' हे नरेन्द्र ! तुम अपने स्वरूपका स्मरण करो; इन गृधचेष्टाओंको छोड़ो । पाखण्डके साथ वार्तालाप करनेके दोषसे ही तुम गृध हुए हो ॥८०॥
फिर दुसरे जन्ममें काक योनिको प्राप्त होनेपर भी अपने पतिको योगबलसे पाकर उस सुन्दरीने कहा - ॥८१॥
" हे प्रभो ! जिनके वशीभूत होकर सम्पूर्ण सामन्तगण नाना प्रकारकी वस्तुएँ भेटं करते थे वही आप आज काकयोनिको प्राप्त होकर बलिभोजी हुए है " ॥८२॥
इसी प्रकार काक - योनिमें भी पूर्वजन्मका स्मरण कराये जानेपर राजाने अपने प्राण छोड़ दिये और फिर मयूर - योगिमें जन्म लिया ॥८३॥
मयुरवस्थामें भी काशिराजकी कन्या उसे क्षण - क्षणमें अति सुन्दर मयुरेचित आहार देती हुई उसकी टहल करने लगी ॥८४॥
उस समय राजा जनकने अश्वमेध नामक महायज्ञका अनुष्ठान किया: उस यज्ञमें अवभृथ- स्न्रानके समय उस मयूरको स्नान कराया ॥८५॥
तब उस सुन्दरीने स्वयं भी स्नान कर राजाको यह स्मरण कराया कि सुन्दरीने स्वयं भी स्नन कर राजाको यह स्मरण कराया कि किस प्रकार उसने श्वान और श्रृगाल आदि योनियाँ ग्रहण की थीं ॥८६॥
अपनी जन्म परम्पराका स्मरण होनेपर उसने अपना शरीर त्याग दिया और फिर महात्मा जनकजीके यहाँ ही पुत्ररूपसे जन्म लिया ॥८७॥
तब उस सुन्दरीने अपने तिपाको विवाहके लिये प्रेरित किया । उसकी प्रेरणासे राजाने पिताको विवाहके लिये आयोजन किया ॥८८॥
स्वयंवर होनेपर उस राजकन्याने स्वयंवरमें आये हुए अपने उस परिको फिर पतिभावसे वरण कर लिया ॥८९॥
उस राजकुमारने काशिराजसुताके साथ नाना प्रकारके भोग भोगे और फिर पिताके परलोकवासी होनेपर विदेहनगरका राज्य किया ॥९०॥
उसने बहुत - से यज्ञ किये, याचकोंको नाना प्रकारसे दान दिये, बहुत- से पुत्र उप्तन्न किये और शत्रुओंके साथ अनेकों युद्ध किये ॥९१॥
इस प्रकार उस राजाने पृथिवीका न्यायानुकुल पालन करते हुए राज्यभोग किया और अन्तमें अपने प्रिय प्राणोंको धर्मयुद्धमें छोड़ा ॥९२॥
तब इस सुलोचनाने पहलेके समान फिर अपने चितारुढ पतिका विधिपूर्वक प्रसन्न - मनसे अनुगमन किया ॥९३॥
इससे वह राजा उस राजकन्याके सहित इन्द्रलोकसे भी उत्कष्ट अक्षय लोकोंको प्राप्त हुआ ॥९४॥
हे द्विजश्रेष्ठ ! इस प्रकार शुद्ध हो जानेपर उसने अतुलनीय अक्षय स्वर्ग, अति दुर्लभ दाम्पत्य और अपने पूर्वोर्जित सम्पूर्ण पुण्यका फुल प्राप्त कर लिया ॥९५॥
हे द्विज ! इस प्रकार मैंने तुमसे पाखण्डीसे सम्भाषण करनेका दोष और अश्वमेध - यज्ञमें स्नान करनेका महात्म्य वर्णन कर दिया ॥९६॥
इसलिये पाखण्डी और पापचारियोंसे कभी वार्तालाप और स्पर्श न करे; विशेषतः नित्य- नैमित्तिक कर्मोके समय और जो यज्ञादि क्रियाओंके लिये दीक्षित हो उसे तो उनका संसर्ग त्यागना अत्यन्त आवश्यक है ॥९७॥
जिसके घरमें एक मासतक नित्यकर्मोंका अनुष्ठान न हुआ हो उसको देख लेनेपर बुद्धिमान मनुष्य सुर्यका दर्शन करे ॥९८॥
फिर जिन्होंने वेदत्रयीका सर्वथा त्याग कर दिया है तथा जो पाखण्डियोंका अन्न खाते और वैदिक मतका विरोध करते हैं उन पापात्माओंके दर्शनादि करनेपर तो कहना ही क्या है? ॥९९॥
इन दुराचारी पाखण्डियोंके साथ वार्तालाप करने, सम्पर्क रखने और उठने- बैठनेमें महान् पाप होता है; इसलिये इन सब बातोंका त्या करे ॥१००॥
पाखण्डी, विकर्मी, विडाल - व्रतवाले , * दुष्ट, स्वार्थी, और बगुला - भक्त लोगोंका वाणीसे भी आदर न करे ॥१०१॥
इन पाखण्डी दुराचारी और अति पापियोंका संसर्ग दुरहीसे त्यागने योग्य है । इसलिये इनका सर्वदा त्याग करे ॥१०२॥
इस प्रकार मैंने तुमसे नग्नोंकी व्याख्या की, जिनके दर्शनमात्रसे श्राद्ध नष्ट हो जाता है और जिनके साथ सम्भाषण करनेसे मनुष्यका एक दिनका पुण्य क्षीण हो जाता है ॥१०३॥
ये पाखण्डी बड़े पापी होते हैं, बुद्धिमान पुरुष इनसे कभी सम्भाषण न करे । इनके साथ सम्भाषण करनेसे उस दिनका पुण्य नष्ट हो जाता है ॥१०४॥
जो बिना कारण ही जटा धारण करते अथवा मूँड मुड़ाते हैं , देवता, अतिथि आदिको भोजन कराये बिना स्वयं ही भोजन कर लेते हैं, सब प्रकारसे शौचहीन हैं तथा जल - दान और पितृ-पिण्ड आदिसे भी बहिष्कृत हैं, उन लोगोंसे वर्तालाप करनेसे भी लोग नरकमें जाते हैं ॥१०५॥
इति श्रीविष्णुपुराणे तृतीयेंऽशे अष्टादशोऽध्यायः ॥१८॥
इति श्रीपराशरमुनिविरचिते श्रीविष्णुपरत्वनिर्णायके श्रीमति विष्णुमहापुराणे तृतीयोंऽशः समाप्तः । 
* ' प्रच्छन्नानि च पापानि वैडालं नाम तद्‌व्रम् ' 
अर्थात छिपे - छिपे पाप करना वैडाल नामक व्रत है । जो वैसा करते हैं, ' वे विडाल - व्रतवाले' कहलाते हैं ।
 

विष्णुपुराण - तृतीय अंश Vishnu Puran

Contributor
Chapters
श्रीविष्णुपुराण - तृतीय अंश - अध्याय १ श्रीविष्णुपुराण - तृतीय अंश - अध्याय २ श्रीविष्णुपुराण - तृतीय अंश - अध्याय ३ श्रीविष्णुपुराण - तृतीय अंश - अध्याय ४ श्रीविष्णुपुराण - तृतीय अंश - अध्याय ५ श्रीविष्णुपुराण - तृतीय अंश - अध्याय ६ श्रीविष्णुपुराण - तृतीय अंश - अध्याय ७ श्रीविष्णुपुराण - तृतीय अंश - अध्याय ८ श्रीविष्णुपुराण - तृतीय अंश - अध्याय ९ श्रीविष्णुपुराण - तृतीय अंश - अध्याय १० श्रीविष्णुपुराण - तृतीय अंश - अध्याय ११ श्रीविष्णुपुराण - तृतीय अंश - अध्याय १२ श्रीविष्णुपुराण - तृतीय अंश - अध्याय १३ श्रीविष्णुपुराण - तृतीय अंश - अध्याय १४ श्रीविष्णुपुराण - तृतीय अंश - अध्याय १५ श्रीविष्णुपुराण - तृतीय अंश - अध्याय १६ श्रीविष्णुपुराण - तृतीय अंश - अध्याय १७ श्रीविष्णुपुराण - तृतीय अंश - अध्याय १८