Android app on Google Play

 

होली मनाने का तरीका

होली की पूर्व संध्या पर यानि कि होली पूजा वाले दिन शाम को बड़ी मात्रा में होलिका दहन किया जाता है और लोग अग्नि की पूजा करते हैं। होली की परिक्रमा शुभ मानी जाती है। किसी सार्वजनिक स्थल या घर के आहाते में उपले व लकड़ी से होली तैयार की जाती है। होली से काफ़ी दिन पहले से ही इसकी तैयारियाँ शुरू हो जाती हैं। अग्नि के लिए एकत्र सामग्री में लकड़ियाँ और उपले प्रमुख रूप से होते हैं। गाय के गोबर से बने ऐसे उपले जिनके बीच में छेद होता है जिनको गुलरी, भरभोलिए या झाल आदि कई नामों से अलग अलग क्षेत्र में जाना जाता है । इस छेद में मूँज की रस्सी डाल कर माला बनाई जाती है।

लकड़ियों व उपलों से बनी इस होली का सुबह से ही विधिवत पूजन आरंभ हो जाता है। होली के दिन घरों में खीर, पूरी और पकवान बनाए जाते हैं। घरों में बने पकवानों से भोग लगाया जाता है। दिन ढलने पर मुहूर्त के अनुसार होली का दहन किया जाता है। इसी में से आग ले जाकर घरों के आंगन में रखी निजी पारिवारिक होली में आग लगाई जाती है। इस आग में गेहूँ, जौ की बालियों और चने के होले को भी भूना जाता है। दूसरे दिन सुबह से ही लोग एक दूसरे पर रंग, अबीर-गुलाल इत्यादि लगाते हैं, ढोल बजा कर होली के गीत गाये जाते हैं और घर-घर जा कर लोगों को रंग लगाया जाता है। सुबह होते ही लोग रंगों से खेलते अपने मित्रों और रिश्तेदारों से मिलने निकल पड़ते हैं। गुलाल और रंगों से ही सबका स्वागत किया जाता है। इस दिन जगह-जगह टोलियाँ रंग-बिरंगे कपड़े पहने नाचती-गाती दिखाई पड़ती हैं। बच्चे पिचकारियों से रंग छोड़कर अपना मनोरंजन करते हैं। प्रीति भोज तथा गाने-बजाने के कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं।

होली के अवसर पर सबसे अधिक खुश बच्चे होते हैं वह रंग-बिरंगी पिचकारी को अपने सीने से लगाए, सब पर रंग डालते भागते दौड़ते मजे लेते हैं । पूरे मोहल्ले में भागते फिरते इनकी आवाज सुन सकते हैं “होली है..” । एक दूसरे को रंगने और गाने-बजाने का दौर दोपहर तक चलता है। इसके बाद स्नान कर के विश्राम करने के बाद नए कपड़े पहन कर शाम को लोग एक दूसरे के घर मिलने जाते हैं, गले मिलते हैं और मिठाइयाँ खिलाते हैं।