Get it on Google Play
Download on the App Store

भाग 39

 


इश्क भी क्या बुरी बला है! हाय, इस दुष्ट ने जिसका पीछा किया उसे खराब करके छोड़ दिया और उसके लिए दुनिया भर के अच्छे पदार्थ बेकाम और बुरे बना दिये। छिटकी हुई चांदनी उसके बदन में चिनगारियां पैदा करती है, शाम की ठंडी हवा उसे लू-सी लगती है, खुशनुमा फूलों को देखने से उसके कलेजे में कांटे चुभते हैं, बाग की रविशों पर टहलने से पैरों में छाले पड़ते हैं, नरम बिछावन पर पड़े रहने से हड्डियां टूटती हैं, और वह करवटें बदलकर भी किसी तरह आराम नहीं ले सकता!
खाना-पीना हराम हो जाता है, मिसरी की डली जहर मालूम होती है, गम खाते-खाते पेट भर जाता है, प्यास बुझाने के लिए आंसू की बूंदें बहुत हो जाती हैं, हजार दुख भोगने पर भी किसी की जुल्फ में उलझी हुई जान को निकल भागने का मौका हाथ नहीं लगता! दोस्तों की नसीहतें जिगर के टुकड़े-टुकड़े करती हैं, जुदाई की आग में कलेजा भुजा जाता है, बदन का खून पानी हो जाता है और इसी से उसकी भूख-प्यास दोनों ही जाती रहती हैं। जिसकी सूरत उसकी आंखों में छुपी रहती है, दरोदीवार में वही दिखाई देता है, स्वप्न में भी इठलाता हुआ वही नजर आता है। उसकी सुनी हुई बातें रात-दिन कान में गूंजा काती हैं, हंसी के समय दिखाई दिये हुए मोतियों-से दांत गले का हार बन बैठते हैं, भुलाए नहीं भूलते, जादू भरी चितवनों की याद दिल को उचाट कर देती है, गले में हाथ डालकर ली हुई अंगड़ाई बदन को दबाए देती है, उसकी याद में एक तरफ झुके हुए कभी सीधे भी नहीं होने पाते।
वे दिन-रात आंखें बंद कर हुस्न के बाग में टहला करते हैं। ठंडी सांसें आंधी का काम देती हैं। सूखे पत्ते उड़ाया करते हैं और धीरे-धीरे आप भी ऐसे सूख जाते हैं कि सांस के साथ उड़ जाने की हिम्मत बांधते हैं, मुहब्बत का गुरु चाबुक लिए हरदम पीछे मौजूद रहता है, बुदबुदाते हुए अपने चेले को कहीं ठहरने नहीं देता और न माशूक के नाम के सिवाय कोई दूसरा शब्द मुंह से निकालने देता है।
आदमी का क्या हवा तक ऐसों से दिल्लगी करती है, किवाड़ खटखटा माशूक के आने की याद दिला-दिला चुटकियां लेती है, और कभी कान में झुककर कहती है कि मैं उस गली से आई हूं जिसमें तेरा प्यारा रहता है!
बाग में टहलने के समय हवा के चपेटों में पड़ी हुई पेड़ों की टहनियां हिल-हिलकर अपने पास बुलाती हैं और जब वह पास जाता है हंसी के दो फूल गिराकर चुप हो जाती हैं जिससे उसका दिल और भी बेचैन हो जाता है और वह दोनों हाथों से कलेजा थामकर बैठ जाता है। उसके प्यारे रिश्तेदार यह हालत देख अफसोस करते हैं और उसकी नर्म अंगुलियों को हाथ में लेकर पूछते हैं कि क्या अपनी जुल्फें संवारने के लिए ये नाखून बढ़ा रखे हैं
बेचैनी इतनी बढ़ जाती है कि आधे घंटे तक के लिए भी ध्यान एक तरफ नहीं जमता और न एक जगह थोड़ी देर तक आराम के साथ बैठने की मोहलत मिलती है। आंखों में छिपी रहने वाली नींद भी न मालूम कहां चली जाती है और अपनी जगह टकटकी को जो दम-दम में तरह-तरह की तस्वीरें बनाने और बिगाड़ने वाली है, छोड़ जाती है।
यही हमारे कुंअर इंद्रजीतसिंह और उनकी प्यारी किशोरी की हालत है, इस समय दोनों एक-दूसरे से दूर पड़े हैं मगर मुहब्बत का भूत रंग-बिरंगी सूरत बना दोनों की आंखों में नाचा करता है और बढ़ती हुई उदासी और बेचैनी को किसी तरह कम नहीं होने देता।
रोहतासगढ़ महल में रहने वाली जितनी औरतें हैं सभी के किशोरी की खातिरदारी का ध्यान रहने पर भी किशोरी की उदासी किसी तरह कम नहीं होती। यद्यपि उसे यहां किसी तरह की भी तकलीफ नहीं थी मगर कलेजे को टुकड़े-टुकड़े करने वाली बात एक सायत के लिए भी उसके दिल से नहीं भूलती थी जो उसने यहां आने के साथ ही पीठ पर हाथ फेरते हुए महाराज के मुंह से सुनी थी, अर्थात - “यह तो मेरी पतोहू होने लायक है!”
यों तो ऊंचे दर्जे की औरतों के जिद करने से लाचार होकर जनाने नजरबाग में किशोरी को टहलना ही पड़ता था मगर वहां की कोई चीज उस बेचारी के जी को ढाढ़स नहीं दे सकती थी। खिले हुए गुलाब के फूल पर नजर पड़ते ही वह मुर्झा जाती, नर्गिस की तरफ देखते ही उसकी शर्मीली आंखें पलकों की चिलमन में छिप जातीं, सरों के पास पहुंचते ही वह गम के बोझ से झुक जाती और खुशनुमा फूलों से लदी हुई पेचीली लतायें उसके सामने पड़कर कुंअर इंद्रजीतसिंह की सुंबली जुल्फों की याद दिलातीं जिसमें उलझी हुई उसकी जान को जीते जी छूटने की उम्मीद न थी।
रविशों को वह यार की जुदाई का मैदान समझती, छोटे-छोटे रंगीन फूलों से भरे हुए पेड़ों की क्यारियों को वह घना जंगल जानती और गूंजते हुए भौंरों की आवाज उसके कानों में झिल्ली की झनकार मालूम होती जो जंगल में बिना मौसम पर ध्यान दिये बारहों महीने बोला और इत्तिफाक से आ पड़े हुए नाजुक-बदनों के कलेजों को दहलाया करती है।
नर्म हवा के झोंकों से हिलती हुई रंग-बिरंगी खूबसूरत पत्तियों को देखते ही वह कांप जाती, सुंदर और साफ मोती-सरीखे जल से भरे और बहते हुए बनावटी झरने के पास पहुंचते ही उसका दिल डूब जाता, छूटते हुए फव्वारे पर नजर पड़ते ही कलेजा मुंह को आता और आंखों से टपाटप आंसू की बूंदें गिरने लगतीं जिन्हें देख तरह-तरह की बोलियों से दिल खुश करने वाली बाग की नाजुक चिड़ियों से चुप न रहा जाता और वे बोल उठतीं - “हाय-हाय! इस बेचारी का दिल किसी की जुदाई में खून हो गया और वह खून पानी होकर आंखों की राह निकला जाता है।”
उन कुछ जवान, नाजुक और चंचल औरतों को जो किशोरी के साथ रहने पर मुस्तैद की गई थीं उसकी हालत पर अफसोस आता मगर लाचार थीं क्योंकि उन्हें अपनी जान बहुत प्यारी थी।
रात के समय जब किशोरी अपने को अकेली पाती, तरह-तरह की बातें सोचा करती। कभी तो वह निकल भागने की तरकीब सोचती मगर अनहोनी जान उधर से खयाल को लौटाकर अपने प्यारे इंद्रजीतसिंह की तरफ ध्यान लगाती और कहती कि क्या वे मेरी मदद न करेंगे और मुझे यहां से न छुड़ावेंगे नहीं, जरूर छुड़ावेंगे, मगर कब जब उन्हें यह खबर होगी कि किशोरी फलानी जगह कैद है। हाय-हाय! कहीं ऐसा न हो कि खबर होते-होते तक मुझे यह दुनिया छोड़ देनी पड़े और दिल के अरमान दिल ही में ले जाने पड़ें। नहीं, अगर मेरे साथ जबर्दस्ती की जायगी तो जरूर ऐसा करूंगी और सिवाय उसके जिसके ऊपर न्योछावर हो चुकी हूं, दूसरे की न कहलाऊंगी, ऐसी नौबत आने के पहले ही शरीर छोड़ उनसे जा मिलूंगी, कोई ताकत ऐसी नहीं जो ऐसा करने से मुझे रोक सके। हे ईश्वर! क्या तू उन आफत के परकाले ऐयारों को यहां का रास्ता न बतावेगा जो कुमार के लिए जान तक दे देने को हरदम मुस्तैद रहते हैं
एक रात वह इसी सोच-विचार में पड़ी थी कि सबेरा हो गया और कमरे के बाहर से एक ऐसी आवाज उसके कान में आई कि वह चौंक पड़ी। उसके फैले हुए खयाल इकट्ठे हो गये, साथ ही कुछ-कुछ खुशी उसके चेहरे पर झलकने लगी। वह आवाज यह थी -
“यह काम बेशक वीरेंद्रसिंह के ऐयारों का है।”
किशोरी उठ खड़ी हुई और कमरे के बाहर निकलने पर घंटे ही भर में उसे मालूम हो गया कि कुंअर कल्याणसिंह को वीरेंद्रसिंह के ऐयार लोग ले भागे।
अब किशोरी को अपने छूटने की कुछ-कुछ उम्मीद हुई और वह दिन भर इसी खयाल में डूबी रहने लगी कि देखें इसके आगे क्या होता है।